Wheelchair: मरीज के सोचने भर से ही चलने लगेगी व्हीलचेयर, जानिए कैसे काम करती है तकनीक

सेरेब्रल पॉल्सी और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारी से जूझने वाले मरीजों को जल्द ही मूवमेंट के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं होगी.
 
मरीज के सोचने भर से ही चलने लगेगी व्हीलचेयर, जानिए कैसे काम करती है तकनीक

सेरेब्रल पॉल्सी और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारी से जूझने वाले मरीजों को जल्द ही मूवमेंट के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं होगी. ऐसे मरीजों के लिए अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खास तरह की व्हीलचेयर तैयार की है जो दिमाग में सोचने भर से ही चलने लगती है.

किन मरीजों के आएगी काम... वैज्ञानिकों का कहना है, यह दिव्‍यांगों के अलावा उन मरीजों के काम आएगी जो स्‍पाइल इंजरी से जूझ रहे हैं या हाथ-पैरों में मूवमेंट की क्षमता नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है, दुनिया में करोड़ों लोग मोटर डिसएबिलिटी की बीमारी जैसे सेरेब्रल पॉल्‍सी, मस्‍कुलर डिस्‍ट्रॉफी से जूझ रहे हैं उनके लिए यह काफी मददगार साबित होगी. सिर्फ अमेरिका में ही 55 लाख लोग इससे जूझ रहे है.किन मरीजों के आएगी काम... वैज्ञानिकों का कहना है, यह दिव्‍यांगों के अलावा उन मरीजों के काम आएगी जो स्‍पाइल इंजरी से जूझ रहे हैं या हाथ-पैरों में मूवमेंट की क्षमता नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है, दुनिया में करोड़ों लोग मोटर डिसएबिलिटी की बीमारी जैसे सेरेब्रल पॉल्‍सी, मस्‍कुलर डिस्‍ट्रॉफी से जूझ रहे हैं उनके लिए यह काफी मददगार साबित होगी. सिर्फ अमेरिका में ही 55 लाख लोग इससे जूझ रहे है

 व्‍हीलचेयर
कैसे बनाई गई... टेक्‍सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, इस व्‍हीलचेयर के साथ मरीजों को एक खास तरह का स्‍कलकैप यानी हेलमेट पहनना होगा. इसमें 31 तरह के इलेक्‍ट्रोड लगे हैं जो मरीज की जरूरत के मुताबिक दिमाग के सिग्‍नल को पढ़ने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा व्‍हीलचेयर में एक लैपटॉप को भी फ‍िक्‍स किया गया है जो AI यानी आर्टिफ‍िशियल इंटेलिजेंस की मदद से सिग्‍नल को मूवमेंट में तब्‍दील करने का काम करता है.कैसे बनाई गई... टेक्‍सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, इस व्‍हीलचेयर के साथ मरीजों को एक खास तरह का स्‍कलकैप यानी हेलमेट पहनना होगा. इसमें 31 तरह के इलेक्‍ट्रोड लगे हैं जो मरीज की जरूरत के मुताबिक दिमाग के सिग्‍नल को पढ़ने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा व्‍हीलचेयर में एक लैपटॉप को भी फ‍िक्‍स किया गया है जो AI यानी आर्टिफ‍िशियल इंटेलिजेंस की मदद से सिग्‍नल को मूवमेंट में तब्‍दील करने का काम करता है.

​​ व्‍हीलचेयरकैसे काम करेगी व्‍हील लेयर... लम्‍बे समय से इस व्‍हीलचेयर पर काम किया जा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है, अगर मरीज दाईं ओर जाना चाहते हैं तो उन्‍हें बस उन्‍हें यह सोचना पड़ेगा कि वो अपने हाथों और पैरों को दाईं ओर मोड़ रहे हैं. ऐसा करने पर ब्रेन में सिग्‍नल जेनरेट होंगे और उस बात को इलेक्‍ट्रोड समझने की कोशिश करेंगे.  लैपटाॅप के जरिए उस सिग्‍नल को आर्टिफ‍िशियकल इंटेलिजेंस की मदद से मूवमेंट में बदला जाएगा. ऐसा होने पर व्‍हीलचेयर दाईं ओर मुड़ जाएगी)
कैसे काम करेगी व्‍हील लेयर... लम्‍बे समय से इस व्‍हीलचेयर पर काम किया जा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है, अगर मरीज दाईं ओर जाना चाहते हैं तो उन्‍हें बस उन्‍हें यह सोचना पड़ेगा कि वो अपने हाथों और पैरों को दाईं ओर मोड़ रहे हैं. ऐसा करने पर ब्रेन में सिग्‍नल जेनरेट होंगे और उस बात को इलेक्‍ट्रोड समझने की कोशिश करेंगे. लैपटाॅप के जरिए उस सिग्‍नल को आर्टिफ‍िशियकल इंटेलिजेंस की मदद से मूवमेंट में बदला जाएगा. ऐसा होने पर व्‍हीलचेयर दाईं ओर मुड़ जाएगी

 व्‍हीलचेयरअमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसी व्‍हीलचेयर विकसित की है जो मरीज के सोचनेभर से ही कंट्रोल की जा सकेगी. यह व्‍हीलचेयर ब्रेन के सिग्‍नल को समझकर उसके हिसाब से मूव करेगी. इसे तैयार करने करने वाली टेक्‍सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, व्‍हीलचेयर इस्‍तेमाल करने वाले मरीजों को सिर्फ यह सोचना होगा कि वो अपने हाथ-पैर हिला रहे हैं. बस ऐसा सोचने भर से ही व्‍हीलचेयर में मूवमेंट शुरू हो जाएगा. जानिए इसमें किस तरह की तकनीक का इस्‍तेमाल किया गया
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसी व्‍हीलचेयर विकसित की है जो मरीज के सोचनेभर से ही कंट्रोल की जा सकेगी. यह व्‍हीलचेयर ब्रेन के सिग्‍नल को समझकर उसके हिसाब से मूव करेगी. इसे तैयार करने करने वाली टेक्‍सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, व्‍हीलचेयर इस्‍तेमाल करने वाले मरीजों को सिर्फ यह सोचना होगा कि वो अपने हाथ-पैर हिला रहे हैं. बस ऐसा सोचने भर से ही व्‍हीलचेयर में मूवमेंट शुरू हो जाएगा. जानिए इसमें किस तरह की तकनीक का इस्‍तेमाल किया गया

 व्‍हीलचेयर
टेस्ट्रिंग कितनी सफल...  इस व्‍हीलचेयर में सेंसर्स लगाए गए हैं जो मरीज को किसी दुर्घटना से रोकने का काम भी करता है. इसकी टेस्टिंग 3 मरीजों पर की गई है. टेस्टिंग के दौरान 60 बार अलग-अलग तरह से व्‍हीलचेयर को मूव कराने का काम किया गया है. टेस्‍ट‍िंग सफल रही है. अंतिम ट्रायल के दौरान 87 फीसदी तक सटीक नतीज नजर आए. ट्रायल के दौरान मरीजों ने जैसा मूवमेंट करने का कहा 87 फीसदी तक वैसा ही हुआ.(फोटो साभार: University of Texas)
टेस्ट्रिंग कितनी सफल... इस व्‍हीलचेयर में सेंसर्स लगाए गए हैं जो मरीज को किसी दुर्घटना से रोकने का काम भी करता है. इसकी टेस्टिंग 3 मरीजों पर की गई है. टेस्टिंग के दौरान 60 बार अलग-अलग तरह से व्‍हीलचेयर को मूव कराने का काम किया गया है. टेस्‍ट‍िंग सफल रही है. अंतिम ट्रायल के दौरान 87 फीसदी तक सटीक नतीज नजर आए. ट्रायल के दौरान मरीजों ने जैसा मूवमेंट करने का कहा 87 फीसदी तक वैसा ही हुआ.