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45 साल का हुआ सिरसा….जानिए इस शहर की क्या है खासियत

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सिरसा 45 वर्ष का हो गया है। सिरसा ने जहां खेत, खेल और सियासत में नई ऊंचाइयों को छुआ, वहीं पिछले 4 दशक में सिरसा उद्योग, सड़क, परिवहन के लिहाज से अपेक्षित तरक्की नहीं कर पाया। भौगोलिक लिहाज से 7 खंडों और 4277 वर्ग किलोमीटर में फैले और सियासी नजरिए से 5 विधानसभा हलकों वाले सिरसा को जिला बने हुए 40 वर्ष का वक्त हो गया है। 1 सितंबर 1975 को सिरसा जिले के रूप में अस्तित्व में आया था।

सिरसा के लोगों ने अनेक क्षेत्रों में पिछले कुछ अरसे में नए आयाम रचे हैं। गेहूं उत्पादन में सिरसा देश में दूसरे पायदान पर जबकि प्रदेश में पहले स्थान पर है। प्रदेश की 40 फीसदी कॉटन का उत्पादन यहां होता है। उत्पादन में भी यह जिला प्रदेश में पहले स्थान पर है। प्रति व्यक्ति आय में यह जिला कभी देश में अव्वल रहा है। यहां की अनाज मंडी भारत की सबसे बड़ी है।

सामाजिक सरोकारों का निर्वहन यहां के लोग शिद्दत के संग कर रहे हैं। रक्तदान में यह जिला विश्व रिकॉर्डधारी है। देश को यह जिला नेत्रदान और देहदान का भी पाठ पढ़ा रहा है। यह वह जिला है जिसने देश को उप-प्रधानमंत्री, प्रदेश को एक मुख्यमंत्री और अनेक मंत्री दिए हैं परंतु तस्वीर के उजले पहलू संग धुंधला पहलू भी है।

प्रदेश के एक कोने पर बसा सिरसा उद्योगों के लिहाज से लंगड़ी चाल लिए हुए है। अतिक्रमण, धूल-मिट्टी, यातायात जाम जैसी समस्याओं से लोग आजिज हैं। कभी सरस्वती नगर, कभी राजा सारस की नगरी, कभी बाबा सरसाईनाथ की नगरी तो कभी शैरिष्क नगर और अब सिरसा। कहते हैं कि पहुंचे हुए संत बाबा सरसाईनाथ के नाम पर सिरसा का नाम पड़ा।

प्राचीन नगर है सिरसा
महाभारत में भी जिक्र मिलता है। पर आधुनिक सिरसा बसा 1837 में। बहुत कम लोग जानते होंगे कि सिरसा वर्ष 1837 से लेकर 1884 तक जिले के रूप में देश के मानचित्र पर अस्तित्व में रहा। उस समय सिरसा जिला बहुत ही समृद्ध और विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ था। सिरसा जिला में फतेहाबाद व फाजिल्का क्षेत्र भी शामिल था।

अंग्रेजी हकूमत ने अपनी मंशा पूरी होने के बाद 1884 में सिरसा जिला तोड़ दिया। सिरसा जिला के 126 गांव जिला हिसार में व डबवाली वाली तहसील के 31 गांवों को फिरोजपुर जिला में मिला दिया गया। खास बात है कि 1837 में सिरसा जिला तो बन गया लेकिन प्राचीन सिरसा नगर लगभग तहस-नहस हो चुका था। अलबत्ता 1 सितम्बर 1975 को हिसार से पृथक होकर सिरसा पुन: जिला बना। जिला बनने के बाद सिरसा ने उपेक्षा के बीच पिछले 38 बरस में समृद्धि का सफर तय किया है।

3 राज्यों की संस्कृति
राजस्थान और पंजाब से सटे इस जिला में तीनों राज्यों की संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है। बागड़ी एवं पंजाबी संस्कृति को समेटे सिरसा जिला के लोगों ने अपने बलबूते नई पहचाना बनाई है। 334 गांवों को समेटे 4277 वर्ग किलोमीटर में फैले सिरसा जिला ने पिछले 3 दशक में खेती, दुग्ध उत्पादन क्षेत्रों में विशेष तौर पर प्रगति की है।

खेती के क्षेत्र में तो सिरसा ने हरित क्रांति के दौर पंजाब के क्षेत्रों की तरह प्रगति की। 1975 में धान का उत्पादन 29 हजार मीट्रिक टन, कॉटन का 1.52 लाख टन, गेहूं का उत्पादन 1.60 लाख टन था। अब हर वर्ष औसतन 1.40 लाख मीट्रिक टन धान, 10 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उत्पादन होता है।

खेल से लेकर फिल्मी दुनिया में चमकाया नाम
भारतीय हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह इसी जिला के छोटे से गांव संतनगर के रहने वाले हैं। मिट्टी वाजां मारदी, मेरा पिंड, मुंडे यूके दे जैसी फिल्मों का निर्देशन कर पंजाबी सिनेमा को नया जीवन देने वाले मनमोहन सिंह भी सिरसा के रहने वाले हैं। भारतीय हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह सिरसा जिला के गांव संतनगर के रहने वाले हैं।

राजनेताओं की नगरी
सियासी रंग भी सिरसा में खूब हैं। प्रदेश में या तो जाटलैंड रोहतक को राजनीति का गढ़ कहा जाता है या फिर प्रदेश के अंतिम छोर पर बसे सिरसा को। पूर्व उप-प्रधानमंत्री देवीलाल सिरसा के गांव चौटाला में जन्मे।

उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला भी राज्य के मुख्यमंत्री रहे और फिलहाल इनैलो प्रमुख हैं।

उद्योगों के लिहाज से स्थिति चिंताजनक
चिंताप्रद बात है कि सिरसा जिला उद्योगों में अभी भी पिछड़ा हुआ है। वर्ष 1997 में  जिला में लघु एवं कुटीर उद्योगों की संख्या 6736 थी। अब यह संख्या 2000 से कम रह गई है। पिछला डेढ़ दशक तीव्र तरक्की वाला रहा है, पर इसी अरसे में सिरसा में 4500 से अधिक उद्योग बंद हो गए हैं।

इसी प्रकार 1997 में लघु व कुटीर उद्योगों में 10,000 से अधिक लोग कार्यरत थे, मगर अब यह संख्या महज 4000 से भी कम रह गई है। यानी 15 वर्ष में जहां उद्योगों की संख्या बढऩे की बजाय घट गई, वहीं 6000 से अधिक लोगों से रोजगार छिनने से उनके परिवारों को 2 जून की रोटी के लाले पड़ गए।

पर्यावरण में है पिछड़ा
पर्यावरण गंभीर मसला है। पर पर्यावरण में पिछले 4 दशक में क्या काम हुआ, 1971, 81 व 91 की गणना वाली सरकारी पुस्तकों को पढ़कर जाना जा सकता है। इनके अनुसार 1981 में जिला में 1.12 फीसदी भूमि पर वन थे। 1991 में भी संख्या यही थी। 2001 में थी इतनी ही। सिरसा जिला 4277 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है।

अगर आंकड़ों का खेले देखे तो वर्ष 2000-2001 में जिला में वन विभाग द्वारा लगाए गए नंबरिंग वाले 619,302 पेड़ थे, जो वर्ष 2005-06 में कम होकर 549,988 रह गए। वर्तमान में कितने पेड़ हैं के सवाल पर अधिकारी चुप्प हो जाते हैं।

आध्यात्मिक नगरी
वैसे सिरसा को आध्यात्मिक नगरी भी कहा जाता है। यहां पर चारों दिशाओं में डेरे हैं। बेगू रोड पर डेरा सच्चा सौदा है जो 1948 में स्थापित हुआ। जीवनगर नामधारी समुदाय का पवित्र स्थल है तो हिसार रोड पर सिकंदरपुर में डेरा राधा स्वामी है।

शहर में डेरा बाबा सरसाईनाथ और रानियां गेट के पास बाबा बिहारी की समाधि है जबकि रानियां रोड पर श्री तारकेश्वर धाम है। हिसार रोड पर गांव संघर साधा में डेरा बाबा भूम्मण शाह है।

इसके अलावा नगर में अनेक मंदिर, ऐतिहासिक महत्व के गुरुघर और सुभाष चौक पर जामा मस्जिद है जबकि पुराने बस स्टैंड के पास करीब 150 वर्ष पुराना सैंट मैथोडिस्ट चर्च है।

पांडवों ने भी काटा था वनवास
सिरसा नगर का इतिहास बहुत प्राचीन है। सरस्वती नदी के तट पर बसा होने के कारण बहुत समय पूर्व सिरसा का नाम सरस्वती नगर था।

प्रचलित जनश्रुति के अनुसार हजारों साल पहले अपने वनवास काल के समय 5 पांडवों में से नकुल व सहदेव ने यहां वनवास काटा। 1173 में राजा सारस के वंशज पालवंशीय राजा कुंवरपाल सरस्वती नगर पर राज करते थे। हजारों वर्ष पहले इस क्षेत्र में जंगल ही जंगल थे और इसे कुरु प्रदेश के नाम से जाना जाता था।

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