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गांव का इतिहास

जानिये किसने बसाया था बरासरी गांव, कैसे पड़ा था गांव का नाम ?

My Sirsa News

हरियाणा के सिरसा जिले में गांवों के इतिहास से रूबरू करवा रहा My Sirsa आज आपके सामने चोपटा खंड के ऐसे गांव जो दो राज्यों की परंपरा पर आधारित है उसका इतिहास बताने जा रहा है। सिरसा से 22 किलोमीटर और  उत्तर भारत के प्रसिद्ध देवस्थान गोगामेडी से करीब 25 किलोमीटर दूर बसा गांव बरासरी (barasari village history) अपने आप में एक अलौकिक सौंदर्य को समेटे हुए हैं। इस गांव की संस्कृति राजस्थान और हरियाणा पर आधारित है।

गांव बुजुर्गों की अगर मानें तो गांव की उतप्ति करीब 15वीं सदी में हुई थी। आज के समय में 4000 की आबादी वाले इस गांव को बैराराम गुर्जर ने बसाया था। गांव में आज लगभग सभी जातियों के लोग हैं। जो मिलजुलकर और शांति के साथ रहते हैं। इस गांव के लोग धर्म के प्रति काफी लगाव रखते हैं। गांव में मुख्य देवस्थान हनुमान जी का मंदिर, गोगामेडी मंदिर, ठाकुर जी का मंदिर, रामदेव जी मंदिर, (निर्माणाधीन ) है बरासरी गांव का विद्यालय प्रांगण अपने आप में अलौकिक सौंदर्य रूप लिए हुए हैं।

वहीं गांव की उत्पति और बसाने वाले की बात करें तो बैराराम गुर्जर ने यहां पर आकर गाय चरानी शुरू की थी। जिसके बाद गांव को सरकारी आंकड़ों में नाम दर्ज करवाने में काफी मसक्कत करनी पड़ी है। गांव के नाम का अस्तित्व अगर सरकारी आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 1781 में आया था। ग्रामीणों द्वारा बताया यह भी जा रहा है कि बेराराम गुर्जर राजस्थान के गांव रसलाना से यहां पर आया था। ग्रामीणों की माने तो बरासरी गांव का 5500 का रकबा है। ग्रामीणों का कहना है कि उस समय गांव में मिट्ठे पानी की सुविधा होने के कारण आस पास के लोग आकर बसने लगे थे।

वहीं इस समय गांव बरासरी में सभी मुलभूत सुविधा जैसे जलघर, खेल मैदान, पशु चिकित्सालय, ग्राम सचिवालय, पटवार भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, ई मित्र जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध है। यह गांव कृषि आधारित गांव है। गांव में मुख्य रूप से तीन नहरों से सिंचाई होती है। जिसमें जमाल माइनर, कुतियाना माइनर, और नोहर फीडर शामिल है।
गांव के लोग अधिकतर लोग कृषि से अपना जीवन निर्वहन कर रहे हैं। वहीं गांव के युवा वर्ग अत्यंत ओजस्वी है जो विशेष ख्याति प्राप्त कर चुका है। आज के समय में गांव शिक्षा के क्षेत्र में अग्रसर होता जा रहा है। हरियाणा बोर्ड में बीते साल गांव के ही विद्यार्थियों ने दूसरा स्थान हासिल किया था। गांव के अनेक युवा औज सरकारी और निजी नौकरियों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वहीं आज गांव के युवा भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं जो गांव के लिए बहुत ही गर्व की बात है।

वैसे तो संपूर्ण बरासरी गांव दान वीरों की भूमि है, लेकिन पंडित रामजी लाल शर्मा के सहयोग को कदापि भुलाया नहीं जा सकता। जिन्होंने गांव के विद्यालय प्रांगण में अनेक कमरों और विद्यालय द्वार का निर्माण करवाया जो सराहनीय है| इसके अलावा गांव के सबसे पुराने अध्यापक आदरणीय गुरु जी श्री सुरजीत सिंह पूनिया जी और श्री बृजलाल भारद्वाज जी ने अपने जीवन का अहम हिस्सा विद्यालय प्रांगण को फसल की सिंचाई की भांति सींच कर दिया है।

अब बात करें यहां की परंपरा और वेशभूषा की तो वह अत्यंत असमरमणीय है गांव में अत्यंत प्राचीन परंपराएं और वेशभूषा मौजूद है। यहां हर त्योहार परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। जिसमें गणगौर, सूरज रोटियां, जलवा पूजन, और वैवाहिक बनोरा, आदि प्राचीन परंपराएं हैं यहां के बुजुर्गों का परिधान मुख्यतः धोती कुर्ता और सिर पर खंडका है वहीं बुजुर्ग औरतों का परिधान घाघरा है जो एक अस्मरणीय और प्राचीनतम वेशभूषा है। उपरोक्त विशेषताओं, भौगोलिक दृष्टि, संस्कृति, परंपराओं, और वेशभूषा के आधार पर हमारा बरासरी किसी लोक से कम नहीं है। आओ हम सब मिलकर इस लोक को और सुंदर बनाएं।

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